गुप्त नवरात्रि : माता रानी की आराधना का पर्व, कामाख्या में तांत्रिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व

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आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि का शुभारंभ 15 जुलाई 2026 से हो गया है। यह पर्व 23 जुलाई तक मनाया जाएगा, हालांकि कुछ विद्वानों के अनुसार तिथि गणना के आधार पर इसका समापन 22 जुलाई को ही माना जा रहा है। गुप्त नवरात्रि के अवसर पर बुधवार सुबह से ही श्रद्धालुओं ने माता के पूजन-अर्चन का कार्य प्रारंभ कर दिया। घर-घर में कलश स्थापना, माता की चौकी स्थापना तथा विधि-विधान से देवी आराधना की जा रही है।

वर्ष में दो बार आती है गुप्त नवरात्रि

सनातन परंपरा के अनुसार वर्ष भर में चार नवरात्रियां आती हैं, जिनमें चैत्र और शारदीय नवरात्रि सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं, जबकि आषाढ़ और माघ मास में आने वाली दो नवरात्रियां गुप्त नवरात्रि कहलाती हैं। इनका विशेष महत्व तांत्रिक साधना और गुप्त उपासना के लिए माना जाता है। सामान्य भक्त भी इस अवधि में देवी की आराधना करते हैं, जबकि साधक गुरु के मार्गदर्शन में विशेष साधनाएं संपन्न करते हैं।

दस महाविद्याओं की होती है आराधना

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुप्त नवरात्रि में देवी की दस महाविद्याओं की पूजा का विशेष विधान है। इनमें तारा, षोडशी (त्रिपुरसुंदरी), भैरवी, छिन्नमस्ता, बगलामुखी, कमला, धूमावती, मातंगी, काली और भुवनेश्वरी प्रमुख मानी जाती हैं। साधक इन देवियों की कृपा प्राप्त करने के लिए जप, तप, हवन, तंत्र, मंत्र तथा यंत्र प्रतिष्ठा जैसे अनुष्ठान करते हैं।

गुरु के मार्गदर्शन में ही की जाती है तंत्र साधना

गुप्त नवरात्रि में अनेक साधक गुरु की प्रेरणा से गुप्त साधनाएं करते हैं। इनमें ध्यान, हवन, तांत्रिक अनुष्ठान, मंत्र-जप तथा यंत्र स्थापना प्रमुख होते हैं। शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि तंत्र साधना सदैव योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करनी चाहिए। बिना गुरु के इस प्रकार की साधनाएं करना उचित नहीं माना गया है।

कामाख्या शक्तिपीठ का विशेष महत्व

असम के गुवाहाटी स्थित नीलांचल पर्वत पर विराजमान मां कामाख्या का मंदिर देश के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। गुप्त नवरात्रि और तांत्रिक साधना के संदर्भ में इस मंदिर का विशेष महत्व माना जाता है। देश-विदेश से बड़ी संख्या में साधक, अघोरी, तांत्रिक, संत एवं श्रद्धालु यहां माता के दर्शन और साधना के लिए पहुंचते हैं।

शक्तिपीठ से जुड़ी धार्मिक मान्यता

धार्मिक मान्यता के अनुसार माता सती की योनि इसी स्थान पर गिरी थी, जिसके कारण कामाख्या मंदिर को अत्यंत सिद्ध शक्तिपीठ माना जाता है। यहां माता की कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है, बल्कि प्राकृतिक शिला स्वरूप स्थित पवित्र गर्भगृह की पूजा की जाती है, जिसे देवी के शक्ति स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।

अंबुबाची मेले का धार्मिक महत्व

कामाख्या मंदिर में प्रतिवर्ष अंबुबाची मेले का आयोजन होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में माता रजस्वला होती हैं, इसलिए मंदिर कुछ दिनों के लिए बंद रहता है और पुनः विशेष पूजा के बाद श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है। इस अवसर पर भक्तों को माता का आशीर्वाद स्वरूप लाल रंग का पवित्र वस्त्र (अंगवस्त्र) प्रसाद के रूप में प्रदान किया जाता है। यह मेला तांत्रिक परंपरा और शक्ति उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

गुप्त नवरात्रि में घरों पर भी होती है विशेष पूजा

अनेक श्रद्धालु अपने घरों में रहकर भी माता की आराधना करते हैं। इस दौरान दुर्गा सप्तशती का पाठ, दुर्गा चालीसा, हवन, जप, उपवास और विशेष पूजन किया जाता है। हालांकि अधिकांश लोग चैत्र और शारदीय नवरात्रि का व्रत रखते हैं, जबकि गुप्त नवरात्रि मुख्यतः साधकों और तांत्रिक उपासना करने वालों के लिए अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।

देश के 51 शक्तिपीठों का महत्व

भारत सहित उपमहाद्वीप में माता के 51 शक्तिपीठ माने जाते हैं। नवरात्रि के दौरान इन सभी शक्तिपीठों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इनमें से कुछ शक्तिपीठ दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित हैं, जहां पहुंचना कठिन माना जाता है। कई शक्तिपीठ वर्तमान पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी स्थित हैं, जबकि अधिकांश भारत में हैं।

शक्तिपीठों की उत्पत्ति की पौराणिक कथा

पुराणों के अनुसार जब राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती ने योगाग्नि द्वारा देह त्याग दी, तब भगवान शिव उनके शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। सृष्टि के संतुलन के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के विभिन्न अंग पृथ्वी पर गिराए। जहां-जहां माता के अंग गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई।

देश के प्रमुख देवी धाम

भारत में हिमाचल प्रदेश के ज्वालामुखी, नैना देवी, चिंतपूर्णी और ब्रजेश्वरी देवी, जम्मू-कश्मीर की माता वैष्णो देवी, असम की कामाख्या देवी, पश्चिम बंगाल का कालीघाट, गुजरात के अंबाजी और पावागढ़, राजस्थान की त्रिपुरा सुंदरी तथा मध्य प्रदेश के बगलामुखी, गढ़कालिका और महामाया मंदिर प्रमुख शक्ति उपासना केंद्र हैं।

नवरात्रि में उमड़ती है आस्था

नवरात्रि के दौरान देशभर के देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। अनेक स्थानों पर विशाल मेले आयोजित होते हैं। गुजरात में गरबा और डांडिया रास के भव्य आयोजन होते हैं, जबकि विभिन्न शक्तिपीठों में विशेष पूजन, हवन और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं।

माता की कृपा का संदेश

धार्मिक विश्वास है कि मां दुर्गा की कृपा जिस भक्त पर होती है, उसके जीवन में सुख, समृद्धि और वैभव का आगमन होता है। श्रद्धा, विश्वास और सच्ची भक्ति से की गई आराधना भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करती है तथा जीवन के कठिन मार्गों को भी सरल बना देती है।

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