पद्मनाभस्वामी मंदिर : इतिहास, रहस्यमयी तहखाने और खजाने से जुड़े विवाद

padmanabhaswamy mandir

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में स्थित श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर भारत के सबसे प्राचीन और समृद्ध मंदिरों में गिना जाता है। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर द्रविड़ स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। धार्मिक आस्था के साथ-साथ यह मंदिर अपने रहस्यमयी तहखानों और अकूत संपदा के कारण विश्वभर में चर्चा का विषय रहा है।

मंदिर कितना पुराना है?

इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का उल्लेख 8वीं–9वीं शताब्दी के ग्रंथों में मिलता है, जबकि कई विद्वानों का मानना है की इसकी स्थापना इससे भी पहले हुई थी। मंदिर का वर्तमान स्वरूप और विस्तार 18वीं शताब्दी में त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा ने कराया था।

वर्ष 1750 में राजा मार्तंड वर्मा ने अपना संपूर्ण राज्य भगवान पद्मनाभ को समर्पित कर स्वयं को केवल उनका सेवक घोषित किया था। इसी परंपरा के कारण त्रावणकोर राजपरिवार आज भी मंदिर से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है।

तहखानों का रहस्य क्या है?

मंदिर के नीचे कई भूमिगत कक्ष (तहखाने) हैं, जिन्हें वॉल्ट A से F (या 1 से 6) तक नाम दिया गया है। वर्ष 2011 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर इनमें से पांच तहखानों का निरीक्षण किया गया था।

इन तहखानों से सोने के मुकुट, स्वर्ण मूर्तियां, बहुमूल्य आभूषण, हीरे-जवाहरात, दुर्लभ सिक्के तथा अन्य ऐतिहासिक वस्तुएँ प्राप्त हुईं। इनकी अनुमानित कीमत लगभग एक लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक आंकी गई थी। यदि उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को भी जोड़ा जाए, तो वास्तविक मूल्य इससे कहीं अधिक माना जाता है।

रहस्यमयी वॉल्ट बी (तहखाना-2)

सबसे अधिक रहस्य वॉल्ट बी (तहखाना-2) को लेकर है, जिसे आज तक पूरी तरह नहीं खोला गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे खोलना अशुभ माना जाता है। लोकविश्वास है कि इस द्वार पर नागों के प्रतीक बने हुए हैं और इसे केवल विशेष मंत्रों द्वारा ही खोला जा सकता है।

हालांकि इन दावों का कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। धार्मिक भावनाओं और परंपराओं के सम्मान को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इस तहखाने को खोलने की अनुमति नहीं दी है।

क्या खजाना बाहर निकाला गया है?

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि मंदिर के तहखानों से प्राप्त संपत्ति को सरकार या किसी अन्य संस्था द्वारा बाहर निकालकर उपयोग में नहीं लाया गया है।

वर्ष 2011 में केवल सूची तैयार करने और मूल्यांकन के उद्देश्य से इन वस्तुओं का निरीक्षण किया गया था। अधिकांश बहुमूल्य वस्तुएं आज भी सुरक्षित रूप से मंदिर के संरक्षण में रखी हुई है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि मंदिर का खजाना निकाल लिया गया है या उसका उपयोग किया गया है।

क्या मंदिर में चोरी की घटनाएं हुई है?

इतनी विशाल संपदा होने के कारण मंदिर की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर प्रश्न उठते रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों में प्रशासनिक अनियमितताओं तथा कुछ वस्तुओं के गायब होने की आशंकाएँ सामने आई है।

वर्ष 2025 में मंदिर परिसर से गायब हुए सोने के एक हिस्से को बाद में बरामद कर लिया गया था। इस मामले में पुलिस ने जांच शुरू की और कुछ कर्मचारियों से पूछताछ के साथ पॉलीग्राफ परीक्षण की अनुमति भी ली गई।

वर्ष 2026 में भी कुछ स्वर्ण वस्तुओं के गायब होने तथा सुरक्षा व्यवस्था में कमियों के आरोप सामने आए। इन मामलों में जांच रिपोर्ट तैयार की गई और सुरक्षा उपायों को और मजबूत करने की सिफारिश की गई। हालांकि इन मामलों में अंतिम निष्कर्ष और न्यायिक निर्णय अभी भी जांच प्रक्रिया पर निर्भर है।

क्या इन मामलों की जांच हुई है?

मंदिर के प्रबंधन और खजाने की सुरक्षा से जुड़े मामलों में सर्वोच्च न्यायालय कई बार हस्तक्षेप कर चुका है।

वर्ष 2011 में केरल उच्च न्यायालय ने मंदिर के प्रबंधन में परिवर्तन का आदेश दिया था। बाद में 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने त्रावणकोर राजपरिवार को पुनः प्रशासनिक अधिकार प्रदान करते हुए एक निगरानी समिति की व्यवस्था भी स्थापित की। इसके अतिरिक्त समय-समय पर लेखा परीक्षण, सुरक्षा समीक्षा और पुलिस जांच भी कराई जाती रही है।

पद्मनाभस्वामी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत का अद्वितीय प्रतीक है। इसके तहखानों में सुरक्षित संपदा सदियों से राजाओं, व्यापारियों और श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान का परिणाम मानी जाती है।

रहस्यमयी वॉल्ट बी आज भी लोगों की जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है, लेकिन उससे जुड़ी अधिकांश कथाएँ अब तक लोकविश्वास का हिस्सा हैं और उनके समर्थन में कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

जहां एक ओर यह मंदिर भारत की समृद्ध परंपरा का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर इतनी विशाल संपदा की सुरक्षा, पारदर्शिता और संरक्षण सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। श्रद्धा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच संतुलन बनाकर ही इस अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखा जा सकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता से परिचित हो सकें।

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