भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का आधार यह है कि प्रत्येक नागरिक को समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले। इसी उद्देश्य से समय-समय पर चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है, जिसे परिसीमन कहा जाता है।
जनसंख्या में परिवर्तन, नए राज्यों का गठन तथा मतदाताओं की संख्या में वृद्धि के कारण निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं एवं सीटों के पुनर्वितरण की आवश्यकता पड़ती है। भारत में अब तक चार बार परिसीमन आयोग गठित किए जा चुके हैं।
परिसीमन क्या है?
परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं निर्धारित अथवा पुनर्निर्धारित की जाती हैं। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक सांसद या विधायक लगभग समान जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करे।
यह कार्य संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत गठित स्वतंत्र परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है। आयोग के निर्णय अंतिम होते हैं और उन्हें सामान्यतः न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
भारत में कब-कब हुआ परिसीमन?
- पहला परिसीमन (1952)
स्वतंत्रता के बाद पहला परिसीमन 1951 की जनगणना के आधार पर किया गया। इसी के आधार पर देश के प्रथम आम चुनाव आयोजित हुए। उस समय लोकसभा में लगभग 494 सीटें थीं। यह भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में निर्वाचन क्षेत्रों के वैज्ञानिक निर्धारण की पहली प्रक्रिया थी।
- दूसरा परिसीमन (1963)
दूसरा परिसीमन 1961 की जनगणना के आधार पर किया गया।
1956 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद नई प्रशासनिक परिस्थितियों के अनुरूप निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण आवश्यक हो गया था। इस परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 522 हो गई तथा राज्य विधानसभाओं की कुल सीटें लगभग 3,771 तक पहुंच गईं।
- तीसरा परिसीमन (1973)
तीसरा परिसीमन 1971 की जनगणना पर आधारित था।
इसके बाद लोकसभा की निर्वाचित सीटों की संख्या बढ़कर 543 हो गई, जो आज भी यथावत है। राज्य विधानसभाओं की कुल सीटें लगभग 3,997 थीं। यह भारत का अंतिम परिसीमन था जिसमें राज्यों के बीच सीटों का वास्तविक पुनर्वितरण किया गया।
- चौथा परिसीमन (2002)
चौथा परिसीमन 2001 की जनगणना के आधार पर गठित आयोग द्वारा किया गया।
हालांकि इस बार लोकसभा की कुल सीटों अथवा राज्यों के बीच सीटों के बंटवारे में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन किया गया ताकि प्रत्येक क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या अपेक्षाकृत संतुलित रहे। इसी परिसीमन के आधार पर 2009 का लोकसभा चुनाव कराया गया।
1976 के बाद सीटों का पुनर्वितरण क्यों रोक दिया गया?
आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन (1976) के माध्यम से लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों का पुनर्वितरण 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर (फ्रीज) कर दिया गया।
इसका उद्देश्य यह था कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन एवं जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है, उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान न उठाना पड़े।
बाद में 84वें संविधान संशोधन (2001) द्वारा इस व्यवस्था को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया गया। हालांकि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में परिवर्तन की अनुमति दी गई, लेकिन राज्यों के बीच सीटों का बंटवारा यथावत रखा गया।
वर्तमान स्थिति क्या है?
आज लोकसभा में 543 निर्वाचित सदस्य हैं, जबकि भारत की जनसंख्या 1971 के लगभग 55 करोड़ से बढ़कर 140 करोड़ से अधिक हो चुकी है।
इसके बावजूद सांसदों की संख्या लगभग वही बनी हुई है। परिणामस्वरूप अनेक लोकसभा क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या 25 से 30 लाख तक पहुंच गई है, जबकि कुछ क्षेत्रों में यह संख्या अपेक्षाकृत काफी कम है।
इसी प्रकार कई राज्यों के विधानसभा क्षेत्रों में भी जनसंख्या का बड़ा असंतुलन दिखाई देता है। इससे समान प्रतिनिधित्व का लोकतांत्रिक सिद्धांत प्रभावित होता है।
वर्तमान समय में परिसीमन की आवश्यकता क्यों है?
- जनसंख्या में व्यापक परिवर्तन
पिछले पांच दशकों में देश की जनसंख्या और उसका भौगोलिक वितरण काफी बदल चुका है। अनेक महानगरों और शहरी क्षेत्रों में आबादी तेजी से बढ़ी है, जबकि कुछ क्षेत्रों में वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही है। पुराने निर्वाचन क्षेत्र वर्तमान जनसंख्या वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करते।
- समान प्रतिनिधित्व का सिद्धांत
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है
एक व्यक्ति, एक वोट, एक समान मूल्य।
यदि एक सांसद 30 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करे और दूसरा केवल 15 लाख लोगों का, तो प्रतिनिधित्व में असमानता उत्पन्न होती है। परिसीमन इस असंतुलन को दूर करने का माध्यम है।
- महिला आरक्षण का क्रियान्वयन
महिला आरक्षण संबंधी संवैधानिक प्रावधानों को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए भी नए परिसीमन की आवश्यकता मानी जा रही है, क्योंकि आरक्षित सीटों का निर्धारण परिसीमन के बाद ही संभव होगा।
- नई संसद भवन की क्षमता
नई संसद भवन का निर्माण भविष्य में लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़ाने की संभावना को ध्यान में रखकर किया गया है। इससे संकेत मिलता है कि भविष्य में परिसीमन के बाद सांसदों की संख्या बढ़ाई जा सकती है।
परिसीमन से जुड़ी प्रमुख चुनौतियां और विवाद
परिसीमन को लेकर सबसे बड़ा विवाद उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संतुलन का है। दक्षिण भारत के अधिकांश राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है, जबकि कई उत्तरी राज्यों की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है।
यदि सीटों का पुनर्वितरण केवल जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो उत्तर भारत की लोकसभा सीटें बढ़ सकती हैं और दक्षिणी राज्यों का राष्ट्रीय राजनीतिक प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो सकता है। इसी कारण परिसीमन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक, संवैधानिक और संघीय संतुलन का भी महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
परिसीमन भारतीय लोकतंत्र की एक आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराना है। 1952, 1963, 1973 और 2002 में हुए परिसीमन ने समय-समय पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत किया। किंतु 1976 में सीटों के पुनर्वितरण पर लगी रोक के कारण आज प्रतिनिधित्व में असंतुलन स्पष्ट दिखाई देता है।
2026 के बाद होने वाला अगला परिसीमन भारत की राजनीति, संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को नई दिशा देने वाला ऐतिहासिक कदम सिद्ध हो सकता है। इसके लिए जनसंख्या, क्षेत्रीय संतुलन और राष्ट्रीय एकता—तीनों के बीच संतुलित समाधान खोजना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
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