चतुर्थ ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर, जहां ॐ की दिव्य ध्वनि में विराजते है भोलेनाथ

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हम अपने पाठकों को भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों के बारे में निरंतर जानकारी देते हुए श्रावण के पावन माह में भगवान भोलेनाथ के दिव्य स्थानों से परिचित करा रहे हैं। इसी कड़ी में आज हम आपको चतुर्थ ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में बताने जा रहे है।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में पवित्र नदी नर्मदा के तट पर स्थित मंधाता द्वीप पर विराजमान है। यह स्थान अपनी प्राकृतिक संरचना के कारण ‘ॐ’ या ओंकार पर्वत के आकार में दिखाई देता है। इसी कारण इस स्थान का नाम ओंकारेश्वर पड़ा।

ओंकारेश्वर के आसपास नर्मदा नदी बहती है और सघन वन क्षेत्र होने के कारण यह इलाका हरियाली से आच्छादित रहता है। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य मन को मोह लेता है। नर्मदा में स्नान का भी अपना विशेष महत्व है। मान्यता है कि जिस प्रकार गंगा में स्नान करने से पापों का क्षय होता है, उसी प्रकार नर्मदा के दर्शन मात्र से पाप और कष्ट दूर हो जाते हैं।

शिवपुराण में वर्णित है ज्योतिर्लिंग की कथा

शिवपुराण के अनुसार, विंध्याचल पर्वत को नारद मुनि ने भगवान भोलेनाथ की तपस्या करने के लिए प्रेरित किया था। इसके बाद विंध्याचल पर्वत ने इसी स्थान पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। इसी पौराणिक मान्यता के कारण ओंकारेश्वर को भगवान शिव के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में विशेष स्थान प्राप्त है।

ओंकारेश्वर और ममलेश्वर, दोनों के दर्शन जरूरी

ओंकारेश्वर क्षेत्र की एक विशेषता यह भी है कि यहां दो ज्योतिर्लिंग माने जाते है ओंकारेश्वर और ममलेश्वर। दोनों ज्योतिर्लिंग अलग-अलग स्थानों पर स्थित हैं। मान्यता है कि दोनों के दर्शन करने के बाद ही ओंकारेश्वर क्षेत्र की यात्रा पूर्ण मानी जाती है।

भगवान शिव और माता पार्वती खेलते है चौपड़

ओंकारेश्वर से जुड़ी एक बेहद रोचक धार्मिक मान्यता भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव माता पार्वती के साथ यहां चौपड़ खेलने आते हैं। इसी मान्यता के चलते मंदिर में प्रतिदिन रात्रि भगवान के शयन के समय चौपड़ सजाकर रखी जाती है। भक्तों की आस्था है कि भगवान शिव आज भी माता पार्वती के साथ यहां आकर चौपड़ खेलते हैं। इस परंपरा को देखने और इससे जुड़ी मान्यता को महसूस करने के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्सुकता रहती है।

प्राचीन नागर शैली की अद्भुत वास्तुकला

ओंकारेश्वर मंदिर अत्यंत प्राचीन है और अपनी वास्तुकला के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। मंदिर का निर्माण प्राचीन नागर शैली में हुआ है। यहां अनेक कलात्मक एवं सुंदर स्तंभ, शिलालेख और उत्कृष्ट कारीगरी देखने को मिलती है। इस पवित्र स्थल पर पहुंचकर भगवान ओंकारेश्वर के दर्शन करने वाले भक्त स्वयं को धन्य महसूस करते हैं। मंदिर और आसपास का आध्यात्मिक वातावरण मन को शांति प्रदान करता है।

आठ किलोमीटर लंबी परिक्रमा का विशेष महत्व

ओंकारेश्वर मंदिर क्षेत्र की परिक्रमा का भी अत्यंत धार्मिक महत्व है। करीब आठ किलोमीटर लंबे परिक्रमा मार्ग पर अनेक प्राचीन मंदिर और धार्मिक स्थल स्थित हैं। श्रद्धालु इस पूरे मार्ग की परिक्रमा करते हैं और भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते है।

परिक्रमा मार्ग में एक विशाल शिवलिंग मंदिर भी पड़ता है। इससे जुड़ी एक रोचक स्थानीय मान्यता प्रचलित है। कहा जाता है कि एक समय यह शिवलिंग सफेद और पारदर्शी था, जिसमें तीन जन्मों को देखा जा सकता था। एक बार किसी राजा ने इसमें अपना अगला जन्म देखा, जिसमें उसे गधे का जन्म दिखाई दिया। इससे क्रोधित होकर राजा ने इस शिवलिंग को जला दिया, जिसके बाद यह काला पड़ गया।

इस विशाल शिवलिंग को लेकर एक अन्य मान्यता भी है। कहा जाता है कि यदि सगे मामा और भांजा इस शिवलिंग को दोनों ओर से अपनी बांहों में लेते हैं तो उनके हाथ दोनों सिरों से छू जाते हैं। वहीं, यदि वे सगे मामा-भांजा नहीं हैं तो शिवलिंग को दोनों ओर से बांहों में लेना संभव नहीं होता।

परिक्रमा मार्ग पर पांडवकालीन कई प्राचीन चिन्ह भी मिलने की बात कही जाती है। पूरे मार्ग में बंदरों के समूह भी बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं। मान्यता है कि इस परिक्रमा को करने से भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा प्राप्त होती है और मन को अत्यधिक शांति मिलती है।

श्रावण में उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब

श्रावण के महीने, महाशिवरात्रि और कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर ओंकारेश्वर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने के साथ पवित्र नर्मदा नदी में स्नान भी करते है। नर्मदा नदी से प्राप्त शिवलिंगों को ‘नर्मदेश्वर’ कहा जाता है। यहां आने वाले कई श्रद्धालु छोटे-बड़े नर्मदेश्वर शिवलिंग अपने घरों और शिवालयों में स्थापित करने के लिए ले जाते है।

अद्वैत लोक बना आकर्षण का केंद्र

मध्य प्रदेश सरकार ने ओंकारेश्वर में भगवान शंकराचार्य को समर्पित अद्वैत लोक की भी स्थापना की है। यह धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व के साथ-साथ पर्यटन की दृष्टि से भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन रहा है।

मोरटक्का का झूलता पुल

ओंकारेश्वर क्षेत्र में नर्मदा नदी पर मोरटक्का का झूलता पुल भी आकर्षण का केंद्र है। इस पुल के बीच में किसी प्रकार के पाये या स्तंभ नहीं हैं। यह दोनों किनारों पर बने स्तंभों के सहारे टिका हुआ है। इसी वजह से इसे ‘झूलता पुल’ कहा जाता है।

आस्था, भक्ति और मोक्ष का दिव्य संगम

ओंकारेश्वर मंदिर देश के बारह प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसी कारण यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने पहुंचते है।ओंकारेश्वर सनातन संस्कृति, शिवभक्ति, तप, श्रद्धा और मोक्ष की भावना का दिव्य प्रतीक है। नर्मदा की पावन धारा के मध्य स्थित यह तीर्थ प्रत्येक श्रद्धालु को यह संदेश देता है कि सच्ची आस्था, समर्पण और भक्ति से भगवान शिव की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।

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