जलाशयों पर सौर क्रांति ! 5,070 करोड़ की योजना से तैरेंगे सोलर प्लांट

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नई दिल्ली। भारत में सौर ऊर्जा के विस्तार की दिशा में केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना को मंजूरी दी है। 31 जुलाई 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत इस योजना पर कुल 5,070 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। योजना का उद्देश्य देश के जलाशयों और अन्य उपयुक्त अंतर्देशीय जल निकायों पर 5,000 मेगावाट क्षमता के फ्लोटिंग सोलर फोटोवोल्टिक संयंत्र स्थापित करना है। खास बात यह है कि इन संयंत्रों के साथ ऊर्जा भंडारण प्रणाली भी लगाई जाएगी, जिससे सूर्यास्त के बाद भी बिजली की उपलब्धता बनी रहे और ग्रिड की विश्वसनीयता बढ़ाई जा सके।

पानी की सतह बनेगी बिजली का नया मैदान

अब तक बड़े सौर संयंत्रों के लिए विशाल भूमि की आवश्यकता होती रही है। इससे जमीन के उपयोग, कृषि भूमि और अन्य विकास गतिविधियों के बीच प्रतिस्पर्धा पैदा होती है। फ्लोटिंग सोलर तकनीक इस चुनौती का एक नया समाधान प्रस्तुत करती है।

इस तकनीक में सौर पैनलों को विशेष तैरने वाले प्लेटफॉर्म पर स्थापित किया जाता है, जिन्हें जलाशय की सतह पर सुरक्षित तरीके से लगाया जाता है। प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना के माध्यम से देश के मौजूदा जलाशयों और औद्योगिक तालाबों का उपयोग बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा। इससे एक ओर जमीन की बचत होगी, वहीं दूसरी ओर पहले से उपलब्ध जल संसाधनों का अतिरिक्त उपयोग संभव होगा। सरकार के अनुसार, देश में फ्लोटिंग सोलर की मौजूदा क्षमता करीब 700 मेगावाट है, जिसे इस योजना के माध्यम से बढ़ाकर 5,000 मेगावाट करने का लक्ष्य रखा गया है।

5,000 मेगावाट सौर क्षमता के साथ 10,000 मेगावाट घंटे भंडारण

इस योजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक ऊर्जा भंडारण प्रणाली है। प्रस्तावित फ्लोटिंग सोलर परियोजनाओं के साथ कम से कम दो घंटे की भंडारण क्षमता रखी जाएगी। कुल मिलाकर यह लगभग 10,000 मेगावाट घंटे की ऊर्जा भंडारण क्षमता होगी।

इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि सौर ऊर्जा का उत्पादन दिन में सूर्य के प्रकाश पर निर्भर करता है। शाम के समय जब बिजली की मांग बढ़ती है, उस समय सौर उत्पादन कम हो जाता है। ऐसे में बैटरी या अन्य ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में दिन के दौरान जमा बिजली का जरूरत के समय इस्तेमाल किया जा सकेगा। इससे बिजली ग्रिड पर अचानक बढ़ने वाले दबाव को कम करने और पीक डिमांड को संभालने में मदद मिलेगी।

देश में 102 गीगावाट से अधिक की संभावना

फ्लोटिंग सोलर की संभावनाएं केवल 5,000 मेगावाट तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान के आकलन के अनुसार, देश के जलाशयों और अन्य उपयुक्त अंतर्देशीय जल निकायों में करीब 102.18 गीगावाट पीक फ्लोटिंग सोलर क्षमता की संभावना है। इस दृष्टि से प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना को एक शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है। यदि तकनीक सफल होती है और राज्यों में बड़े पैमाने पर परियोजनाएं विकसित होती हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत में जलाशय आधारित सौर ऊर्जा का बड़ा नेटवर्क तैयार हो सकता है।

किसानों और जमीन पर घटेगा दबाव

भारत जैसे विशाल और आबादी वाले देश में नवीकरणीय ऊर्जा के लिए जमीन उपलब्ध कराना हमेशा आसान नहीं होता। सौर पार्कों के लिए जमीन का अधिग्रहण कई बार चुनौतीपूर्ण होता है। फ्लोटिंग सोलर इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकता है।

जलाशय की सतह का उपयोग होने से जमीन पर कब्जा किए बिना बिजली उत्पादन संभव होगा। हालांकि, प्रत्येक जलाशय के लिए पर्यावरणीय प्रभाव, जल उपयोग, मत्स्य पालन और स्थानीय परिस्थितियों का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी होगा। सरकार ने योजना में परियोजनाओं की व्यवहार्यता जांच के लिए भी सहायता का प्रावधान किया है।

सरकार देगी केंद्रीय वित्तीय सहायता

योजना के अंतर्गत पात्र फ्लोटिंग सोलर परियोजनाओं के सफलतापूर्वक शुरू होने के बाद प्रति मेगावाट एक करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता देने का केंद्र सरकार का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त व्यवहार्यता अध्ययन के लिए प्रति परियोजना 50 लाख रुपये तक की सहायता उपलब्ध होगी। इसमें जलाशय की गहराई और संरचना से संबंधित अध्ययन, पर्यावरणीय अध्ययन तथा अन्य प्रारंभिक तैयारियां शामिल हो सकती है। परियोजनाओं को वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 के दौरान मंजूरी दी जाएगी, जबकि वित्तीय सहायता का वितरण वित्त वर्ष 2032-33 तक जारी रह सकता है। योजना का लाभ सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को मिल सकेगा।

रोजगार और घरेलू उद्योग को बढ़ावा

फ्लोटिंग सोलर केवल बिजली उत्पादन की योजना नहीं है, बल्कि इसके साथ बड़े औद्योगिक और रोजगार अवसर भी जुड़े हैं। सरकार के अनुमान के अनुसार, योजना से परियोजना की पूरी मूल्य श्रृंखला में लगभग 16,000 से 17,000 पूर्णकालिक समकक्ष रोजगार पैदा हो सकते है। फ्लोटिंग प्लेटफॉर्म, सौर मॉड्यूल, सेल, बैटरी और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के घरेलू निर्माण को भी इससे बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इस प्रकार यह योजना आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के साथ भी जुड़ती है।

पर्यावरण के लिए भी महत्वपूर्ण

सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि बिजली उत्पादन के दौरान जीवाश्म ईंधन आधारित संयंत्रों की तुलना में कार्बन उत्सर्जन काफी कम होता है। केंद्र सरकार का अनुमान है कि इस योजना से हर साल लगभग एक करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है।

इसके अलावा, जलाशयों की सतह पर सौर पैनल लगाने से कुछ परिस्थितियों में पानी के वाष्पीकरण में कमी आने की संभावना भी रहती है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव जलाशय की जलवायु, आकार, पैनलों के कवरेज और स्थानीय पर्यावरण पर निर्भर करेगा। इसलिए प्रत्येक परियोजना के लिए वैज्ञानिक पर्यावरणीय मूल्यांकन महत्वपूर्ण होगा।

बड़ी ऊर्जा रणनीति का हिस्सा

प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना ऐसे समय में आई है जब भारत अपने ऊर्जा क्षेत्र को अधिक स्वच्छ, टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सौर ऊर्जा क्षमता में देश की वृद्धि उल्लेखनीय रही है और अब सरकार का ध्यान केवल जमीन पर सौर संयंत्र लगाने तक सीमित नहीं है। छतों, कृषि क्षेत्रों और जलाशयों सभी संभावित स्थानों को ऊर्जा उत्पादन से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।

फ्लोटिंग सोलर तकनीक भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में बड़ी संख्या में बांध, जलाशय, औद्योगिक जल निकाय और अन्य जल क्षेत्र मौजूद हैं। यदि इनका उपयोग पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाए, तो पानी की सतह आने वाले वर्षों में बिजली उत्पादन का नया माध्यम बन सकती है।

जलाशय बन सकते हैं स्वच्छ ऊर्जा के केंद्र

कुल मिलाकर 5,070 करोड़ रुपये की प्रधानमंत्री सूर्य सरोवर योजना भारत की अक्षय ऊर्जा यात्रा में एक नया अध्याय खोलने वाली पहल है। जमीन के बजाय जलाशयों की सतह पर सौर पैनल, उनके साथ ऊर्जा भंडारण और देश में 5,000 मेगावाट नई फ्लोटिंग सोलर क्षमता ये तीनों मिलकर भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था को अधिक लचीला और टिकाऊ बना सकते हैं।

अब असली चुनौती होगी कि परियोजनाओं का चयन वैज्ञानिक ढंग से हो, जलाशयों के पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा की जाए और योजनाओं को समय पर जमीन पर उतारा जाए। यदि ऐसा हुआ तो भारत के जलाशय केवल पानी के भंडार नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा के विशाल स्रोत भी बन सकते है।

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