चार दिशाओं में भारत की कूटनीति, दुनिया के प्रमुख शक्ति केंद्रों तक एक साथ पहुंच

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अगस्त 2026 के अंतिम सप्ताह में भारतीय कूटनीति का एक असाधारण दृश्य देखने को मिल रहा है। भारत सरकार के शीर्ष स्तर के मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एक ही समय में दुनिया के अलग-अलग महत्वपूर्ण शक्ति केंद्रों में सक्रिय है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कनाडा और अमेरिका की यात्रा पर हैं, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल जापान में है, विदेश मंत्री एस. जयशंकर रूस में रहकर आर्थिक और रणनीतिक मुद्दों पर बातचीत कर चुके हैं, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल चीन में भारत-चीन सीमा वार्ता में शामिल हुए है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगामी ब्रिक्स शिखर बैठक से पहले यह व्यापक कूटनीतिक सक्रियता दिखाई दे रही है। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो ये चारों प्रधानमंत्री की विदेश नीति के अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है।

अमेरिका में आर्थिक कूटनीति

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की कनाडा और अमेरिका यात्रा का मुख्य फोकस आर्थिक संबंध, निवेश और वैश्विक वित्तीय सहयोग है। उनकी यात्रा 25 अगस्त से 2 सितंबर तक प्रस्तावित है। इस दौरान निवेशकों, कारोबारी समूहों तथा जी-20 से जुड़े आर्थिक विमर्श में भागीदारी शामिल है। अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते अब केवल रक्षा और रणनीतिक सहयोग तक सीमित नहीं हैं। तकनीक, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा, निवेश, आपूर्ति श्रृंखला और भारतीय बाजार में विदेशी पूंजी जैसे मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण हो गए है। ऐसे समय में वित्त मंत्री का अमेरिकी निवेशकों से संवाद भारत की आर्थिक कूटनीति का हिस्सा है। संदेश स्पष्ट है भारत वैश्विक पूंजी और तकनीक के लिए खुला है, लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों के साथ।

जापान में व्यापार और निवेश

पीयूष गोयल की जापान यात्रा भारत की आर्थिक और व्यापारिक कूटनीति को आगे बढ़ाती है। जापान भारत के लिए केवल एक कारोबारी साझेदार नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ भी है। गोयल की यात्रा में व्यापार, निवेश और भारत-जापान आर्थिक साझेदारी को मजबूत करने पर जोर है। उनके साथ बड़ा भारतीय उद्योग प्रतिनिधिमंडल भी गया है। जापान के साथ संबंधों में भारत की रुचि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक सहयोग लगातार महत्वपूर्ण हो रहा है। भारत जापानी निवेश को विनिर्माण, बुनियादी ढांचे और तकनीकी क्षेत्रों में आकर्षित करना चाहता है।

रूस से रणनीतिक संतुलन

विदेश मंत्री एस. जयशंकर की रूस यात्रा भारत की उस नीति का प्रतीक है, जिसमें नई दिल्ली किसी एक शक्ति गुट पर निर्भर नहीं रहना चाहती। मॉस्को में जयशंकर ने भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग की बैठक में भाग लिया। दोनों देशों के बीच व्यापार, अर्थव्यवस्था, विज्ञान, तकनीक और सांस्कृतिक सहयोग पर चर्चा हुई। रूस के साथ भारत के संबंधों का एक महत्वपूर्ण पक्ष रक्षा और ऊर्जा है। यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों तथा रूस के बीच तनाव बढ़ा है, लेकिन भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की नीति जारी रखी है। जयशंकर की रूस यात्रा यही संदेश देती है कि भारत अमेरिका के साथ साझेदारी बढ़ाते हुए भी रूस के साथ अपने पारंपरिक और रणनीतिक संबंधों को समाप्त नहीं करेगा।

चीन में सबसे संवेदनशील कूटनीति

इन चारों यात्राओं में सबसे संवेदनशील यात्रा अजीत डोभाल की चीन यात्रा है। डोभाल ने 25 अगस्त को चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ भारत-चीन सीमा मुद्दे पर 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता की। बातचीत में सीमा पर शांति और स्थिरता तथा दोनों देशों के संबंधों को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई। यह यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत-चीन संबंधों में सीमा विवाद सबसे बड़ी चुनौती है। भारत का स्पष्ट संकेत है कि सीमा पर शांति के बिना संबंधों का सामान्यीकरण स्थायी नहीं हो सकता। डोभाल की बातचीत इसी रणनीति का हिस्सा दिखाई देती है तनाव कम करना, सीमा पर स्थिरता बनाए रखना और साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा हितों से समझौता न करना।

आखिर क्या है पूरी कूटनीतिक रणनीति?

चारों यात्राओं को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय यदि एक साथ देखा जाए तो भारत की व्यापक विदेश नीति का चित्र सामने आता है। अमेरिका से निवेश और तकनीक, जापान से व्यापार और विनिर्माण, रूस से ऊर्जा एवं रणनीतिक सहयोग और चीन से सीमा तथा द्विपक्षीय संबंधों को संभालने की कोशिश। यानी भारत एक साथ चार अलग-अलग मोर्चों पर बातचीत कर रहा है। इसे मल्टी-अलाइनमेंट या रणनीतिक स्वायत्तता की नीति के रूप में देखा जा सकता है। भारत किसी एक खेमे में पूरी तरह शामिल होने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हित के अनुसार साझेदारी बढ़ा रहा है।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले बड़ी तैयारी

इस सक्रियता का एक और बड़ा कारण आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन है, जिसकी मेजबानी भारत सितंबर में करने वाला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, एस. जयशंकर, निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल और अजीत डोभाल की गतिविधियों को इस व्यापक कूटनीतिक तैयारी से जोड़कर देखा जा सकता है। दरअसल बदलती विश्व व्यवस्था में भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रहना चाहता। वह अमेरिका और पश्चिम के साथ आर्थिक एवं तकनीकी साझेदारी चाहता है, रूस के साथ पुराने रणनीतिक रिश्तों को बनाए रखना चाहता है, जापान जैसे देशों के साथ इंडो-पैसिफिक सहयोग बढ़ाना चाहता है और चीन के साथ प्रतिस्पर्धा तथा संवाद दोनों को साथ लेकर चलना चाहता है।

बहुध्रुवीय दुनिया में भारत की रणनीति

विदेश में एक साथ दिखाई दे रहे ये चार चेहरे महज यात्राओं का संयोग नहीं है। इनके पीछे भारत की बहुस्तरीय, बहुध्रुवीय और राष्ट्रीय हित केंद्रित कूटनीति की स्पष्ट तस्वीर दिखाई देती है। आने वाले दिनों में इन यात्राओं के परिणाम इस बात को तय करने में महत्वपूर्ण होंगे की भारत वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी भूमिका को किस तरह और अधिक मजबूत करता है।

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