अधिक मास हिन्दू कैलेंडर के अनुसार लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है। इसका कारण यह है कि चन्द्र वर्ष और सौर वर्ष में लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए अतिरिक्त एक महीने को जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।
वर्ष 2026 में अधिक मास कब है?
साल 2026 में अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) 17 मई, रविवार से प्रारंभ होकर 16 जून, सोमवार तक रहेगा। यह ज्येष्ठ मास के साथ पड़ रहा है और इसकी अवधि लगभग 60 दिनों की मानी जाती है। इस पूरे समय भगवान विष्णु की विशेष आराधना की जाती है।
अधिक मास को पुरुषोत्तम मास और मल मास क्यों कहा जाता है?
बारह महीनों के अतिरिक्त एक माह जुड़ने के कारण इसे “अधिक मास” कहा जाता है। शुरुआत में इसे मलिन (अशुद्ध) मानकर “मल मास” कहा गया, क्योंकि इस महीने का कोई देवता नहीं था। तब देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की, और उन्होंने इस मास के अधिपति बनने को स्वीकार किया। भगवान विष्णु का एक नाम “पुरुषोत्तम” भी है, इसलिए यह मास “पुरुषोत्तम मास” कहलाने लगा।
पुराणों के अनुसार अधिक मास की कथा
प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नामक एक असुर ने कठोर तप करके ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया कि वह न दिन में मारा जा सके, न रात में; न जल, थल, नभ में; न किसी अस्त्र-शस्त्र से; और न ही साल के 12 महीनों में। इस वरदान के कारण वह अत्याचारी बन गया और स्वयं की पूजा करवाने लगा।
नारद जी की प्रेरणा से उसके घर भक्त प्रह्लाद का जन्म हुआ। प्रह्लाद की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान नरसिंह प्रकट हुए और उन्होंने संध्या समय, भवन की देहरी पर, अपनी जंघा पर रखकर अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का वध किया। यह घटना अधिक मास में हुई मानी जाती है।
अधिक मास में क्या करें और क्या न करें?
क्या न करें
अधिक मास के दौरान विवाह, नए व्यवसाय की शुरुआत, संपत्ति या वाहन खरीदना शुभ नहीं माना जाता।
क्या करें
इस महीने में भगवान का नाम जप करना, पुराणों का पाठ करना और धार्मिक कथाओं जैसे श्रीमद्भागवत, राम कथा और देवी भागवत का श्रवण या वाचन करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। इसके साथ ही दान-पुण्य करना भी शुभ होता है।
अधिक मास का महत्व
अधिक मास में भगवान विष्णु की विशेष कृपा भक्तों पर रहती है। इसलिए इस समय विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ और भगवान विष्णु की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। उनकी कृपा से माता लक्ष्मी का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।
अतः अधिक मास को “मल मास” समझकर त्याज्य नहीं मानना चाहिए, बल्कि इसे एक पवित्र और पुण्य प्रदान करने वाला माह मानकर श्रद्धा और भक्ति के साथ इसका पालन करना चाहिए।

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