गैस, पेट्रोल-डीजल के क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भर बनेगा

crude oil

दुनिया इस समय वैश्विक ऊर्जा संकट से गुजर रही है। गैस, पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों ने कई देशों की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाल दिया है। ऐसे समय में भारत ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाया है। केंद्र सरकार ने 37,500 करोड़ रुपये की एक महत्वाकांक्षी योजना को मंजूरी दी है, जिसके तहत कोयले से गैस, पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधनों का निर्माण किया जाएगा।

यदि यह योजना सफलतापूर्वक लागू होती है, तो भारत ऊर्जा क्षेत्र में विदेशी निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकता है। इससे न केवल देश में रोजगार बढ़ेंगे, बल्कि विदेशी मुद्रा की भी बड़ी बचत होगी।

वैश्विक संकट के बीच भारत की पहल

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी अस्थिरता के कारण दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है। कई परिवहन जहाज और कार्गो फंसे होने से पेट्रोल, डीजल और गैस की आपूर्ति बाधित हुई है। इसका असर वैश्विक महंगाई और आर्थिक दबाव के रूप में सामने आ रहा है।

ऐसे कठिन समय में भारत ने ऊर्जा संकट से निपटने के लिए दीर्घकालिक समाधान की दिशा में कदम बढ़ाया है।

कोविड के बाद फिर दुनिया को रास्ता दिखाने की तैयारी

कोविड काल में भारत ने वैक्सीन और दवाइयों के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई थी। अब जब दुनिया ऊर्जा संकट का सामना कर रही है, तब भारत कोयले से वैकल्पिक ईंधन निर्माण की तकनीक को बढ़ावा देकर एक नई दिशा देने की कोशिश कर रहा है।

क्या है सरकार की नई योजना?

भारत सरकार ने “सतह आधारित कोयला/लिग्नाइट गैसीकरण परियोजना प्रोत्साहन योजना” को मंजूरी दी है। इस योजना को 13 मई 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति मिली।

योजना के तहत देश के विभिन्न राज्यों में लगभग 25 गैसीकरण संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। सरकार इन परियोजनाओं को आर्थिक सहायता भी देगी। प्रत्येक परियोजना को अधिकतम 5,000 करोड़ रुपये तक प्रोत्साहन राशि दी जा सकती है।

कोयले से कैसे बनेगा गैस, पेट्रोल और डीजल?

कोयला गैसीकरण एक आधुनिक तकनीक है जिसमें कोयले को सीधे जलाने के बजाय रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से “सिनगैस” में बदला जाता है। इस गैस से आगे चलकर कई उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं, जैसे—

  • एलपीजी जैसी गैस
  • सिंथेटिक नेचुरल गैस
  • सीएनजी
  • मेथनॉल
  • अमोनिया
  • हाइड्रोजन
  • यूरिया और उर्वरक
  • औद्योगिक रसायन
  • पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधन

दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में यह तकनीक पहले से उपयोग में है और सफल भी रही है।

भारत के पास है विशाल कोयला भंडार

भारत दुनिया के सबसे बड़े कोयला भंडार वाले देशों में शामिल है। देश में लगभग

  • 401 अरब टन कोयला
  • 47 अरब टन लिग्नाइट भंडार

मौजूद है अनुमान है कि यह भंडार लगभग 200 वर्षों तक देश की जरूरतों को पूरा कर सकता है।

योजना की मुख्य विशेषताएं

1. 75 मिलियन टन कोयले का गैसीकरण लक्ष्य

सरकार ने 75 मिलियन टन कोयले को गैस में बदलने का लक्ष्य रखा है।

2. भारी निवेश की संभावना

इस योजना के माध्यम से 2 से 3 लाख करोड़ रुपये तक के निवेश की संभावना जताई जा रही है।

3. रोजगार के नए अवसर

करीब 25 परियोजनाओं के जरिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 50 हजार रोजगार पैदा हो सकते हैं।

4. कंपनियों को प्रोत्साहन

सरकार संयंत्र और मशीनरी लागत का अधिकतम 20 प्रतिशत तक आर्थिक सहयोग देगी।

देश को क्या होंगे फायदे?

विदेशी निर्भरता कम होगी

भारत अभी एलएनजी, गैस और कई रसायनों के लिए विदेशों पर निर्भर है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात घटेगा।

उर्वरक उत्पादन सस्ता होगा

यूरिया और अमोनिया का घरेलू उत्पादन बढ़ने से किसानों को सस्ते उर्वरक मिल सकते हैं।

विदेशी मुद्रा की बचत

एलएनजी, मेथनॉल और अन्य रसायनों के आयात पर होने वाला भारी खर्च कम होगा।

कोयला उत्पादक राज्यों को लाभ

झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में उद्योग और रोजगार बढ़ सकते हैं।

मेक इन इंडिया को मजबूती

यह योजना आत्मनिर्भर भारत अभियान को नई ताकत दे सकती है।

क्या पर्यावरण को नुकसान होगा?

इस योजना को लेकर पर्यावरण संबंधी चिंताएं भी उठ रही हैं। आलोचकों का मानना है कि कोयला आधारित परियोजनाएं प्रदूषण बढ़ा सकती है।

हालांकि सरकार का दावा है कि गैसीकरण तकनीक पारंपरिक कोयला जलाने की तुलना में अधिक स्वच्छ है और इससे कार्बन उत्सर्जन कम किया जा सकता है। फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को दीर्घकाल में सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर भी तेजी से आगे बढ़ना होगा।

भविष्य में क्या असर पड़ सकता है?

यदि यह योजना सफल रही तो भारत

  • गैस और उर्वरक उत्पादन में आत्मनिर्भर बन सकता है
  • पेट्रोकेमिकल उद्योग का विस्तार कर सकता है
  • ग्रामीण और औद्योगिक क्षेत्रों में रोजगार बढ़ा सकता है
  • विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत कर सकता है
  • ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बना सकता है

हालांकि इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि परियोजनाएं समय पर पूरी हों और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखा जाए।

भारत की ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव

37,500 करोड़ रुपये की यह योजना भारत की ऊर्जा नीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखी जा रही है। सरकार अब केवल कोयला जलाने के बजाय उससे गैस, उर्वरक और रसायन बनाकर उसे मूल्यवर्धित ऊर्जा संसाधन में बदलना चाहती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह पहल दर्शाती है कि भारत कठिन चुनौतियों का समाधान खोजने की क्षमता रखता है। यदि कोयले से ऊर्जा उत्पादन का यह सपना सफल होता है, तो कोविड के बाद भारत एक बार फिर दुनिया में अपनी अग्रणी भूमिका मजबूत कर सकता है।

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