आईएमडी का बड़ा पूर्वानुमान : इस साल सामान्य से कम रह सकती है मानसूनी बारिश

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भारत में वर्ष 2026 का मानसून देश की अर्थव्यवस्था, कृषि, जल संसाधनों और आम जनजीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है आईएमडी के नवीनतम दीर्घावधि पूर्वानुमान के अनुसार, इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कुछ कमजोर रहने की संभावना जताई गई है। कुल मिलाकर मानसून को सामान्य से कम श्रेणी में रखा गया है। अनुमान है कि जून से सितंबर के बीच देशव्यापी वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) के लगभग 92 प्रतिशत के आसपास रह सकती है।

मानसून का महत्व

भारत की लगभग 60 प्रतिशत खेती वर्षा आधारित है। खरीफ फसलें—धान, सोयाबीन, कपास, मक्का और दालें सीधे मानसून पर निर्भर करती हैं। इसके अलावा जलाशयों, भूजल स्तर, बिजली उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर भी मानसून का गहरा प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि मानसून में थोड़ी कमी भी देश की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन पर बड़ा असर डाल सकती है।

2026 के मानसून का समग्र पूर्वानुमान

आईएमडी के अप्रैल 2026 के पहले चरण के पूर्वानुमान के अनुसार पूरे भारत में मानसूनी वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना है। अनुमानित वर्षा लगभग 95 प्रतिशत एलपीए के दायरे में हो सकती है, जबकि केंद्रीय अनुमान लगभग 92 प्रतिशत एलपीए बताया गया है। हालांकि ब्लो नॉर्मल का अर्थ यह नहीं है कि पूरे देश में सूखे जैसी स्थिति बन जाएगी। इसका मतलब केवल इतना है कि कुल औसत वर्षा सामान्य से कम रह सकती है। कुछ क्षेत्रों में अच्छी वर्षा हो सकती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में कमी देखी जा सकती है।

मानसून कमजोर क्यों हो सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार प्रशांत महासागर में अल नीनो परिस्थितियों के विकसित होने की संभावना जताई गई है। अल नीनो अक्सर भारत के मानसून को कमजोर करता है क्योंकि यह अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी तथा वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करता है। इसके अलावा हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के तापमान में बदलाव भी मानसून की तीव्रता को प्रभावित कर सकते हैं। अप्रैल-मई की प्री-मानसून वर्षा, तापमान और हवाओं की दिशा भी वर्षा के वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

मानसून कब आएगा?

आईएमडी के अनुसार वर्ष 2026 में दक्षिण-पश्चिम मानसून केरल तट पर सामान्य तिथि 1 जून से पहले, लगभग 26 मई के आसपास पहुंच सकता है। हालांकि मानसून की जल्दी शुरुआत का अर्थ हमेशा अधिक वर्षा नहीं होता। कई बार मानसून जल्दी आने के बावजूद उसका वितरण कमजोर रह सकता है।

क्षेत्रवार संभावित प्रभाव

उत्तर भारत : पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में सिंचाई व्यवस्था बेहतर होने के कारण प्रभाव सीमित रह सकता है, लेकिन धान की बुवाई प्रभावित होने की आशंका बनी रहेगी।
मध्य भारत : मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और विदर्भ जैसे क्षेत्र मानसून पर काफी निर्भर हैं। यदि वर्षा में कमी रही तो सोयाबीन, दाल और मक्का उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
पूर्वी भारत : बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में सामान्य या मिश्रित वर्षा की संभावना जताई गई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर उतार-चढ़ाव संभव है।
दक्षिण भारत : कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में वर्षा की कमी कृषि और जल संकट को बढ़ा सकती है।
उत्तर-पूर्व भारत : यह क्षेत्र सामान्यतः अधिक वर्षा प्राप्त करता है, लेकिन अनियमित मानसून बाढ़ और भूस्खलन दोनों की स्थिति पैदा कर सकता है।

कृषि पर संभावित प्रभाव

कमजोर मानसून का सबसे बड़ा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है। इसके कारण

  • खरीफ फसलों की बुवाई में देरी हो सकती है।
  • धान, सोयाबीन, कपास और दालों की पैदावार घट सकती है।
  • पशुओं के चारे की कमी हो सकती है।
  • ग्रामीण आय प्रभावित हो सकती है।
  • खाद्य मुद्रास्फीति और महंगाई बढ़ सकती है।

हालांकि यदि वर्षा समय पर और संतुलित तरीके से हुई तो कम कुल वर्षा के बावजूद नुकसान सीमित रह सकता है।

जल संसाधनों पर असर

भारत के अधिकांश बांध, नदियां और भूजल स्रोत मानसून पर निर्भर है। कम वर्षा के कारण

  • जलाशयों का स्तर घट सकता है।
  • पेयजल संकट बढ़ सकता है।
  • बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
  • सिंचाई व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

कमजोर मानसून का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

  • कृषि जीडीपी की वृद्धि धीमी हो सकती है।
  • ग्रामीण बाजारों में मांग घट सकती है।
  • खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती है।
  • सरकार को राहत और जल प्रबंधन पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है।
  • भारत की अर्थव्यवस्था में मानसून आज भी एक निर्णायक भूमिका निभाता है।

क्या सूखे की आशंका है?

फिलहाल पूरे देश में बड़े पैमाने पर सूखे की कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं की गई है। आईएमडी का पूर्वानुमान “ब्लो नॉर्मल” श्रेणी का है, “डेफिसिएंट” श्रेणी का नहीं। इसका अर्थ है कि जोखिम मौजूद है, लेकिन इसे निश्चित सूखे की स्थिति नहीं माना जा सकता।
यदि जून और जुलाई में मानसून की प्रगति अच्छी रही तो हालात बेहतर हो सकते है।

आगे किन बातों पर नजर रहेगी?

  • मानसून की वास्तविक स्थिति आने वाले महीनों में इन कारकों पर निर्भर करेगी।
  • जून अंत तक वर्षा की प्रगति।
  • जुलाई में सक्रिय मानसूनी सिस्टम।
  • अल नीनो की वास्तविक तीव्रता।
  • बंगाल की खाड़ी में निम्न दबाव क्षेत्र।

क्षेत्रीय वर्षा का वितरण

आईएमडी मई के अंत और उसके बाद भी लगातार अद्यतन पूर्वानुमान जारी करता रहेगा। वर्ष 2026 में भारत का मानसून फिलहाल सामान्य से थोड़ा कमजोर रहने का अनुमान है। देशव्यापी वर्षा लगभग 92 प्रतिशत एलपीए के आसपास रह सकती है। कुछ क्षेत्रों में अच्छी बारिश होने की संभावना है, जबकि कुछ इलाकों में कमी देखी जा सकती है।

ऐसे में कृषि, जल प्रबंधन और राज्य सरकारों की तैयारी इस वर्ष विशेष महत्व रखेगी। यदि वर्षा का वितरण संतुलित रहा तो कुल कमी के बावजूद बड़ा संकट टाला जा सकता है। लेकिन यदि अल नीनो मजबूत हुआ और वर्षा असमान रही, तो कृषि और जल संकट दोनों बढ़ सकते हैं। इसलिए आने वाले जून और जुलाई के महीने देश के लिए बेहद निर्णायक साबित होंगे।

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